पित्रसत्तावादी नहीं हूँ, तो
पित्रसत्ता मुझमें भी है
उथली-पुथली-उलझी, जो
समय-समय पर
बिना कोई मौका दिए
शरीर के लगभग सभी अंगो से
बाहर निकलने को आतुर रहती है
और बाहर आ ही जाती है।
मैं, मेंरी ही आँखों में नंगा होता चला जाता हूँ
जब भी तुम मेंरी मुलाकात
मेंरे अंदर के इस घिनौनें जानवर से कराती हो।
No comments:
Post a Comment