रात
पता नहीं क्या-क्या दिखाती है
रिक्शेवाला अपने रिक्शे पर ही सोता हुआ
जनेऊ कान पर लटका मन में अश्लील विचार लाता पंडित
जनेऊ मंदिर के गंगाजल में रख चकलाघर का रास्ता ढूंढ़ता पंडित
घने अँधेरे के नीचे भी अपने लिए एक कोना ढूंढ़ता मुसहर
चुप अपने शरीर पर, मांस पर कुत्ते के जैसे, लिपटे हुए पर, आता वैश्या का दयाभाव
अपने ही शरीर से घिन खाना सीखती वैश्या
पता नहीं क्या-क्या दिखाती है
रिक्शेवाला अपने रिक्शे पर ही सोता हुआ
जनेऊ कान पर लटका मन में अश्लील विचार लाता पंडित
जनेऊ मंदिर के गंगाजल में रख चकलाघर का रास्ता ढूंढ़ता पंडित
घने अँधेरे के नीचे भी अपने लिए एक कोना ढूंढ़ता मुसहर
चुप अपने शरीर पर, मांस पर कुत्ते के जैसे, लिपटे हुए पर, आता वैश्या का दयाभाव
अपने ही शरीर से घिन खाना सीखती वैश्या