तुम जो बोल रहे हो, तुम्हारे लिए, उसमे कोई गलत नहीं है। क्यूंकि हम वही बोलते, करते है जो हमें पढ़ाया, सिखाया जाता है। और तुम भी वही बोल रहे हो जो भारत के लोगो को हजारो सालो से पढ़ाया जा रहा है। जो कुछ तुम मुझे करने से मना कर रहे हो, अगर वही हमें हजारो सालो से पढ़ाया जाता, तो शायद तुम मेरी बातो से इत्तेफाक ना रखते। उदाहरण के तौर पर अगर पूरे भारत को लगातार, बिना रुके, पीड़ी दर पीड़ी ये पढ़ाया जाये कि मुदित उनका भगवान् है, तो शायद नहीं, हर कोई पक्का यही बोलेगा कि मुदित उनका भगवान् है। इसमें गलती उन लोगो कि नहीं है जो मुदित को भगवान् बोल रहे है बल्कि उन लोगो की है जिन्होंने मुदित को भगवान् बनाया। इसके लिए सबसे ज्यादा जरुरी है कि हम हर बात को तर्क की कसौटी पर परखे, बार बार। और यही मैं तुमसे भी बोलूंगा।
भन्ते करुणाशील धम्माचार्य, जिनका ये लेख है, उनको तो मैं भी नहीं जनता और तुम भी नहीं जानते। लेकिन जोति राव फुले और पेरियार रामास्वामी नायकर के बारे मैं तुमने जरूर पढ़ा सुना होगा। भन्ते करुणाशील धम्माचार्य की बातो को तर्क की कसौटी पर परखने के लिए तुम फुले की "गुलामगिरी" और पेरियार कि "सच्ची रामायण" पढ़ सकते हो। और भीम राव अंबेडकर की "बुद्ध और उनका धम्म" भन्ते करुणाशील धम्माचार्य की बातो को तुम्हारे समझने में मदद करेगी। तथा ये भी बताएगी कि तर्क की कसौटी कहते किसे है और चीजो को तर्क की कसौटी पर परखा कैसे जाता है।
मुदित, चलो थोडा बहुत तो तुमको भी मालूम है। तुमने एकदम सही कहा कि, किसी भी धर्म कों जानने के लिए सत्यता, निर्भयता, पवित्रता एवं समर्पिता आदि गुणों का होना आवश्यक है एवं कुशल गुरु के मार्गदर्शन मे धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना पड़ता है। लेकिन इसमें एक चीज कि कमी रह गई, तर्क की। अगर तुम्हारा धर्म तुम्हें तर्क करना नहीं सिखाता, तुम्हारा कुशल गुरु तुम्हें तर्क करना नहीं सिखाता, तो तुम बस एक कोलू के बैल ही बनके रह जायोगे, जो तुम्हारी बातो से, तुम्हारी विचारधारा से साफ़ साफ़ नजर आ रहा है। लेकिन इसमें गलती तुम्हारी नहीं है, गलती है ब्राह्मणवाद की, गलती है हिन्दू धर्म की, कयूंकि ये तर्क करना ही नहीं सिखाते। और इसी वजह से, काफी दुखद है कि, तुम्हें तर्क करना नहीं आया और ना ही अब तुम तर्क करना अब सीखना चाहते हो। "अभी भी खेलनी है होली" लेख की प्रमाणिकता के लिए तुम्हें किताबो के नाम भी बताये, लेकिन तुमने पहले उन्हें पढ़ना जरूरी नहीं समझा, एक विवेकी की तरह उसे तर्क पर परखना जरूरी नहीं समझा। क्यूंकि तुम्हारे ब्राह्मणवाद ने तुम्हें तर्क करना नहीं सिखाया। तुम्हारे हिन्दू धर्म ने तर्क करना नहीं सिखाया। हिन्दू धर्म की बुनियाद ही खुद गैर-तार्किक है, तो वो तुम्हें क्या तर्क करना सिखाएगा। हिन्दू धर्म एक बीमारी है, ये मैं नहीं कह रहा, अम्बेड़कर ने कहा था। अब ये मत बोलना कि, अम्बेड़कर, ये तो ६०-७० साल पुरानी बात है, हमारा हिन्दू धर्म तो हजारो साल पुराना है, अगर हिन्दू धर्म में तर्क न होता तो ये जिन्दा कैसे रह पाता। आंबेडकर और बुद्धा को पढ़ोगे तो तुम्हे पता चलेगा कि हिन्दू धर्म, ब्राह्मणवाद कितनी बड़ी गैर तार्किक संस्थाए और विचारधारा है।
धर्म का मतलब बस उसे आखे मूँद कर उसका पीछा करने से नहीं है, धर्म, खुद धर्म को तर्क की कसौटी पर परखना भी सिखाये और ये भी सिखाये कि उस धर्म से समाज का भला हो ना कि समाज गर्त में जाए। और ये जग-जाहिर है कि हिन्दू धर्म ने, ब्राह्मणवाद ने, जाती व्यवस्था बना भारतीय समाज को सिर्फ गर्त में धकेला है। शायद ये तुम्हें आसानी से समझ आ जाये, और तर्क की जरुरत भी ना पड़े, जो कि तुम्हें वैसे भी नहीं आता। एक कोलू का बैल भी इसे बहुत आसानी से समझ लेगा।
और रही बात मेरी मूढता कों नष्ट करने की और ज्ञान पिपासा कों तृप्त करने की, तो कम से कम तुम उसकी चिंता मत करो। बहुत ज्ञान पिपासा है मुझ में और मूढ़ता भी बहुत है। और मुझे नहीं लगता कि मेरी ज्ञान पिपासा कभी ख़तम होगी, अगर तुम्हारी ज्ञान पिपासा तृप्त हो गई है तो फिर, या तो तुम मानसिक रूप से मृत हो चुके हो या फिर तुम भगवान् बन चुके हो। ना ही मुझे मानसिक रूप से मृत होना है ना और ना ही मुझे भगवान् बनना है। मेरा नाम धम्मा है, मैं धम्मा ही बना रहू मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। तो मूढता और ज्ञान पिपासा तुम ही अपनी ख़तम करो।
और मेरे हिंदू धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने की भी तुम चिंता मत करो, कुछ तो इनको पढ़ ही रखा है, बाकी जो रहा बचा है वो भी मैं जरूर पढूंगा। और इससे मेरी मूढता नष्ट और ज्ञान पिपासा तृप्त नहीं, बल्कि बढ़ेगी ही। क्यूंकि ऐसे गैर तार्किक ग्रंथो पढ़, मुझे नहीं लगता किसी की भी ज्ञान पिपासा तृप्त होगी।
अगर आपको गलत सिखाया, पढाया गया है तो इसमें दोष हिंदू धर्म का ही है। हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवाद एक बिमारी है, और ये पता करने के लिए तुम्हे जरुरत है गैर हिन्दू, गैर ब्राह्मणी विचारधारा वाले महापुरुषो को पढ़ने की, जैसे कि , आंबेडकर, फुले, पेरियार, और बुद्धा, क्यूंकि कोई चोर नहीं बोलता कि उसने चोरी की है। इसी तरह से कोई हिन्दू वादी नहीं बोलेगा कि उसके हिन्दू वाद में खोट है। जब तुम इन लोगो को पढ़ोगे तभी तुम्हे पता चलेगा कि इन्होने किस तरह से, इन महापुरुषो ने किन पहलुओ के आधार पर हिन्दू धर्म पर कुठारघात किये है, हिंदू धर्म सही व्याख्या कर पिछड़े समाज को, सर्वहारा समाज को, दलित बहुजन समाज को, हिन्दू धर्म और इसकी कुप्रथा से बचने की सलाह दी है।
हाँ मैं बौद्ध हूँ और अपने धम्म का ही पालन कर रहा हूं, जो कि मुझे सिखाता है तर्क का प्रयोग करना, ना कि किसी भी धर्म ग्रन्थ को, कोलू के बैल की तरह, बिना तर्क और विवेक के उसका पीछा करना। मेरे मन को शांति भी इसी से मिलती है। तुम्हे मेरे भले कि चिंता करने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए, मुझे बहुत अच्छे से मालूम है कि मेरा भला किसमे है। और ये भी मालूम है कि पिछड़ा, सर्वहारा, दलित बहुजन समाज की भलाई कम से कम हिन्दू धर्म का पीछा करने में नहीं है। अगर इस सर्वहारा वर्ग को इस बीमारी - हिन्दू धर्म- के बारे में पता चलेगा ना तो इसमें इन लोगो का ही भला है। और हिंदूवादियों को लगता क्या है, कि इस हिंदूवाद के सबसे बड़े शिकार दलित है, नहीं, जबकि हिन्दू खुद हिंदूवाद के सबसे बड़े शिकार है। दलित तो फिर भी धीरे धीरे हिंदूवाद के जाल से बहार निकलना सिख रहा है, तर्क करना सिख रहा है और बाहर निकल भी रहा है। लेकिन हिन्दू खुद शायद ही हिंदूवाद के जाल से बाहर निकल पायेगा। और आज जब दलित हिंदूवाद के जाल से बाहर निकलना सीख रहा है, बाहर निकल रहा है तो हिंदूवाद के पहरेदारो को उनके पैरो के नीचे से जमीन खिसकती दिखाई दे रही है। हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी कमी ये है कि ये तर्क करना नहीं सिखाता।
और किस जन मानस कि बात कर रहे हो तुम। इस जन मानस का ८० % हाशिये पर रहता है। इस ८० % को जब हिंदूवाद की कहानी पता चलेगी तो उनमे थोड़ी देर के लिए तो रोष पैदा होगा, लेकिन उनके बाद उनमे भाईचारा और समानता पैदा होगी, जोकि उन्हें हिन्दू धर्म ने कभी नहीं दी। वो तर्क करना सीखेंगे, जो हिंदूवाद उन्हें नहीं सिखा सका।
मुदित, तुमने नैतिकता की बात करी, नैतिकता बहुत बड़ी चीज है। तर्क करना ना सिखाना कहा की नैतिकता है। समाज को तरह तरह की जातियो में बाँट के उनका शोषण करना, कहा की नैतिकता है। हिन्दू धर्म के ग्रंथ, मनुस्मृति में कौन सी, एक भी नैतिकता की बात कही गई है। ये भी हिन्दू धर्म का एक ग्रन्थ है, जिसका तुम बचाव कर रहे थे। नैतिकता, बहुत बड़ी चीज है। एक बार फिर से सोचना, हिन्दू धर्म ने कौन सा एक भी नैतिक काम करा है। नैतिकता की बात करने से पहले एक नहीं दस बार सोचना। घृणित, कुत्सित एवं द्वेषपूर्ण मानसिकता मेरी नहीं इस हिन्दू धर्म को मानने वालो की है।
शब्दो का प्रयोग कर किसी को अपमानित करना बहुत आसान है। जो की तुमने भन्ते करुणाशील धम्माचार्य और उनके लेख को करा। अगर तुम एक विवेकी होते, उस लेख को तर्क की कसौटी पर परखते, तथ्य जुटाते, ना कि धर्म ग्रन्थ में लिखी बातो को आँखे मूँद कर उनका पीछा करते।
सामाजिक वैमन्यास तभी फैलता है जब लोगो में तर्क करने की शक्ति नहीं होती।
अगली बार से किसी के लेख को अभद्र , अपमानजनक, निंदनीय, द्वेषपूर्ण, कुत्सित एवं धार्मिक भावनाओं को भड़कानेवाला और किसी व्यक्ति को बिना जाने धार्मिक अज्ञान एवं मानसिक दीवालियापन बोलने से पहले उसके बारे में जानने की कोशिश करना और हो सके तो अपने तर्क और विवेक का इस्तेमाल करने की कोशिश करना।