Friday, July 17, 2026

रात
पता नहीं क्या-क्या दिखाती है
रिक्शेवाला अपने रिक्शे पर ही सोता हुआ
जनेऊ कान पर लटका मन में अश्लील विचार लाता पंडित
जनेऊ मंदिर के गंगाजल में रख चकलाघर का रास्ता ढूंढ़ता पंडित
घने अँधेरे के नीचे भी अपने लिए एक कोना ढूंढ़ता मुसहर
चुप अपने शरीर पर, मांस पर कुत्ते के जैसे, लिपटे हुए पर, आता वैश्या का दयाभाव
अपने ही शरीर से घिन खाना सीखती वैश्या
dalits who are following hinduism
they are not at all dalit
not hindu
but they are slaves of hinduism
and they dont know this

Friday, March 6, 2020

गैरबराबरी पर बनी संतुलित व्यवस्था
सा दिखावा नहीं, एक भोंडी सच्चाई हूं !

सभ्य-सलीका-शिष्टाचार की बिनती नहीं
एक बीहड़ अगुआई हूं !!

Thursday, March 5, 2020

कुछ उपजाऊ नहीं है यहां
बस जातियां पैदा होती है
मैं नपुंसक,
और तुम बांझ हो गई हो !!

Friday, February 7, 2020

हाथी की सवारी करो - दूर करो ये झाड़ू


पहले पेशे से 
अब राजनीतिक रूप से
थोपा जा रहा है
हमारे ऊपर झाड़ू
आज़ादी-समानता-न्याय की नहीं
गुलामी की निशानी है झाड़ू
अछूत बनाये रखने की साजिश है झाड़ू
आम आदमी की दुर्गति की निशानी है झाड़ू
हाथी की सवारी करो - दूर करो ये झाड़ू
बाबासाहेब ने कहा था
छोड़ो भंगी झाड़ू !!

Wednesday, January 23, 2019

तुम जो बोल रहे हो, तुम्हारे लिए, उसमे कोई गलत नहीं है। क्यूंकि हम वही बोलते, करते है जो हमें पढ़ाया, सिखाया जाता है। और तुम भी वही बोल रहे हो जो भारत के लोगो को हजारो सालो से पढ़ाया जा रहा है। जो कुछ तुम मुझे करने से मना कर रहे हो, अगर वही हमें हजारो सालो से पढ़ाया जाता, तो शायद तुम मेरी बातो से इत्तेफाक ना रखते। उदाहरण के तौर पर अगर पूरे भारत को लगातार, बिना रुके, पीड़ी दर पीड़ी ये पढ़ाया जाये कि मुदित उनका भगवान् है, तो शायद नहीं, हर कोई पक्का यही बोलेगा कि मुदित उनका भगवान् है। इसमें गलती उन लोगो कि नहीं है जो मुदित को भगवान् बोल रहे है बल्कि उन लोगो की है जिन्होंने मुदित को भगवान् बनाया। इसके लिए सबसे ज्यादा जरुरी है कि हम हर बात को तर्क की कसौटी पर परखे, बार बार। और यही मैं तुमसे भी बोलूंगा। 
भन्ते करुणाशील धम्माचार्य, जिनका ये लेख है, उनको तो मैं भी नहीं जनता और तुम भी नहीं जानते। लेकिन जोति राव फुले और पेरियार रामास्वामी नायकर के बारे मैं तुमने जरूर पढ़ा सुना होगा। भन्ते करुणाशील धम्माचार्य की बातो को तर्क की कसौटी पर परखने के लिए तुम फुले की "गुलामगिरी" और पेरियार कि "सच्ची रामायण" पढ़ सकते हो। और भीम राव अंबेडकर की "बुद्ध और उनका धम्म" भन्ते करुणाशील धम्माचार्य की बातो को तुम्हारे समझने में मदद करेगी। तथा ये भी बताएगी कि तर्क की कसौटी कहते किसे है और चीजो को तर्क की कसौटी पर परखा कैसे जाता है।

मुदित, चलो थोडा बहुत तो तुमको भी मालूम है। तुमने एकदम सही कहा कि, किसी भी धर्म कों जानने के लिए सत्यता, निर्भयता, पवित्रता एवं समर्पिता आदि गुणों का होना आवश्यक है एवं कुशल गुरु के मार्गदर्शन मे धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना पड़ता है। लेकिन इसमें एक चीज कि कमी रह गई, तर्क की। अगर तुम्हारा धर्म तुम्हें तर्क करना नहीं सिखाता, तुम्हारा कुशल गुरु तुम्हें तर्क करना नहीं सिखाता, तो तुम बस एक कोलू के बैल ही बनके रह जायोगे, जो तुम्हारी बातो से, तुम्हारी विचारधारा से साफ़ साफ़ नजर आ रहा है। लेकिन इसमें गलती तुम्हारी नहीं है, गलती है ब्राह्मणवाद की, गलती है हिन्दू धर्म की, कयूंकि ये तर्क करना ही नहीं सिखाते। और इसी वजह से, काफी दुखद है कि, तुम्हें तर्क करना नहीं आया और ना ही अब तुम तर्क करना अब सीखना चाहते हो। "अभी भी खेलनी है होली" लेख की प्रमाणिकता के लिए तुम्हें किताबो के नाम भी बताये, लेकिन तुमने पहले उन्हें पढ़ना जरूरी नहीं समझा, एक विवेकी की तरह उसे तर्क पर परखना जरूरी नहीं समझा। क्यूंकि तुम्हारे ब्राह्मणवाद ने तुम्हें तर्क करना नहीं सिखाया। तुम्हारे हिन्दू धर्म ने तर्क करना नहीं सिखाया। हिन्दू धर्म की बुनियाद ही खुद गैर-तार्किक है, तो वो तुम्हें क्या तर्क करना सिखाएगा। हिन्दू धर्म एक बीमारी है, ये मैं नहीं कह रहा, अम्बेड़कर ने कहा था। अब ये मत बोलना कि, अम्बेड़कर, ये तो ६०-७० साल पुरानी बात है, हमारा हिन्दू धर्म तो हजारो साल पुराना है, अगर हिन्दू धर्म में तर्क न होता तो ये जिन्दा कैसे रह पाता। आंबेडकर और बुद्धा को पढ़ोगे तो तुम्हे पता चलेगा कि हिन्दू धर्म, ब्राह्मणवाद कितनी बड़ी गैर तार्किक संस्थाए और विचारधारा है। 
धर्म का मतलब बस उसे आखे मूँद कर उसका पीछा करने से नहीं है, धर्म, खुद धर्म को तर्क की कसौटी पर परखना भी सिखाये और ये भी सिखाये कि उस धर्म से समाज का भला हो ना कि समाज गर्त में जाए। और ये जग-जाहिर है कि हिन्दू धर्म ने, ब्राह्मणवाद ने, जाती व्यवस्था बना भारतीय समाज को सिर्फ गर्त में धकेला है। शायद ये तुम्हें आसानी से समझ आ जाये, और तर्क की जरुरत भी ना पड़े, जो कि तुम्हें वैसे भी नहीं आता। एक कोलू का बैल भी इसे बहुत आसानी से समझ लेगा।

और रही बात मेरी मूढता कों नष्ट करने की और ज्ञान पिपासा कों तृप्त करने की, तो कम से कम तुम उसकी चिंता मत करो। बहुत ज्ञान पिपासा है मुझ में और मूढ़ता भी बहुत है। और मुझे नहीं लगता कि मेरी ज्ञान पिपासा कभी ख़तम होगी, अगर तुम्हारी ज्ञान पिपासा तृप्त हो गई है तो फिर, या तो तुम मानसिक रूप से मृत हो चुके हो या फिर तुम भगवान् बन चुके हो। ना ही मुझे मानसिक रूप से मृत होना है ना और ना ही मुझे भगवान् बनना है। मेरा नाम धम्मा है, मैं धम्मा ही बना रहू मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। तो मूढता और ज्ञान पिपासा तुम ही अपनी ख़तम करो। 
और मेरे हिंदू धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने की भी तुम चिंता मत करो, कुछ तो इनको पढ़ ही रखा है, बाकी जो रहा बचा है वो भी मैं जरूर पढूंगा। और इससे मेरी मूढता नष्ट और ज्ञान पिपासा तृप्त नहीं, बल्कि बढ़ेगी ही। क्यूंकि ऐसे गैर तार्किक ग्रंथो पढ़, मुझे नहीं लगता किसी की भी ज्ञान पिपासा तृप्त होगी। 
अगर आपको गलत सिखाया, पढाया गया है तो इसमें दोष हिंदू धर्म का ही है। हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवाद एक बिमारी है, और ये पता करने के लिए तुम्हे जरुरत है गैर हिन्दू, गैर ब्राह्मणी विचारधारा वाले महापुरुषो को पढ़ने की, जैसे कि , आंबेडकर, फुले, पेरियार, और बुद्धा, क्यूंकि कोई चोर नहीं बोलता कि उसने चोरी की है। इसी तरह से कोई हिन्दू वादी नहीं बोलेगा कि उसके हिन्दू वाद में खोट है। जब तुम इन लोगो को पढ़ोगे तभी तुम्हे पता चलेगा कि इन्होने किस तरह से, इन महापुरुषो ने किन पहलुओ के आधार पर हिन्दू धर्म पर कुठारघात किये है, हिंदू धर्म सही व्याख्या कर पिछड़े समाज को, सर्वहारा समाज को, दलित बहुजन समाज को, हिन्दू धर्म और इसकी कुप्रथा से बचने की सलाह दी है।

 हाँ मैं बौद्ध हूँ और अपने धम्म का ही पालन कर रहा हूं, जो कि मुझे सिखाता है तर्क का प्रयोग करना, ना कि किसी भी धर्म ग्रन्थ को, कोलू के बैल की तरह, बिना तर्क और विवेक के उसका पीछा करना। मेरे मन को शांति भी इसी से मिलती है। तुम्हे मेरे भले कि चिंता करने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए, मुझे बहुत अच्छे से मालूम है कि मेरा भला किसमे है। और ये भी मालूम है कि पिछड़ा, सर्वहारा, दलित बहुजन समाज की भलाई कम से कम हिन्दू धर्म का पीछा करने में नहीं है। अगर इस सर्वहारा वर्ग को इस बीमारी - हिन्दू धर्म- के बारे में पता चलेगा ना तो इसमें इन लोगो का ही भला है। और हिंदूवादियों को लगता क्या है, कि इस हिंदूवाद के सबसे बड़े शिकार दलित है, नहीं, जबकि हिन्दू खुद हिंदूवाद के सबसे बड़े शिकार है। दलित तो फिर भी धीरे धीरे हिंदूवाद के जाल से बहार निकलना सिख रहा है, तर्क करना सिख रहा है और बाहर निकल भी रहा है। लेकिन हिन्दू खुद शायद ही हिंदूवाद के जाल से बाहर निकल पायेगा। और आज जब दलित हिंदूवाद के जाल से बाहर निकलना सीख रहा है, बाहर निकल रहा है तो हिंदूवाद के पहरेदारो को उनके पैरो के नीचे से जमीन खिसकती दिखाई दे रही है। हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी कमी ये है कि ये तर्क करना नहीं सिखाता। 
और किस जन मानस कि बात कर रहे हो तुम। इस जन मानस का ८० % हाशिये पर रहता है। इस ८० % को जब हिंदूवाद की कहानी पता चलेगी तो उनमे थोड़ी देर के लिए तो रोष पैदा होगा, लेकिन उनके बाद उनमे भाईचारा और समानता पैदा होगी, जोकि उन्हें हिन्दू धर्म ने कभी नहीं दी। वो तर्क करना सीखेंगे, जो हिंदूवाद उन्हें नहीं सिखा सका।

मुदित, तुमने नैतिकता की बात करी, नैतिकता बहुत बड़ी चीज है। तर्क करना ना सिखाना कहा की नैतिकता है। समाज को तरह तरह की जातियो में बाँट के उनका शोषण करना, कहा की नैतिकता है। हिन्दू धर्म के ग्रंथ, मनुस्मृति में कौन सी, एक भी नैतिकता की बात कही गई है। ये भी हिन्दू धर्म का एक ग्रन्थ है, जिसका तुम बचाव कर रहे थे। नैतिकता, बहुत बड़ी चीज है। एक बार फिर से सोचना, हिन्दू धर्म ने कौन सा एक भी नैतिक काम करा है। नैतिकता की बात करने से पहले एक नहीं दस बार सोचना। घृणित, कुत्सित एवं द्वेषपूर्ण मानसिकता मेरी नहीं इस हिन्दू धर्म को मानने वालो की है।
शब्दो का प्रयोग कर किसी को अपमानित करना बहुत आसान है। जो की तुमने भन्ते करुणाशील धम्माचार्य और उनके लेख को करा। अगर तुम एक विवेकी होते, उस लेख को तर्क की कसौटी पर परखते, तथ्य जुटाते, ना कि धर्म ग्रन्थ में लिखी बातो को आँखे मूँद कर उनका पीछा करते। 
सामाजिक वैमन्यास तभी फैलता है जब लोगो में तर्क करने की शक्ति नहीं होती। 
अगली बार से किसी के लेख को अभद्र , अपमानजनक, निंदनीय, द्वेषपूर्ण, कुत्सित एवं धार्मिक भावनाओं को भड़कानेवाला और किसी व्यक्ति को बिना जाने धार्मिक अज्ञान एवं मानसिक दीवालियापन बोलने से पहले उसके बारे में जानने की कोशिश करना और हो सके तो अपने तर्क और विवेक का इस्तेमाल करने की कोशिश करना।


Sunday, April 12, 2015

पित्रसत्ता, मुझमें भी है।

पित्रसत्तावादी नहीं हूँ, तो 
पित्रसत्ता मुझमें भी है 
उथली-पुथली-उलझी, जो 
समय-समय पर 
बिना कोई मौका दिए 
शरीर के लगभग सभी अंगो से 
बाहर निकलने को आतुर रहती है 
और बाहर आ ही जाती है। 

मैं, मेंरी ही आँखों में नंगा होता चला जाता हूँ 
जब भी तुम मेंरी मुलाकात 
मेंरे अंदर के इस घिनौनें जानवर से कराती हो। 

Thursday, April 24, 2014

आज मुझे चमार नहीं ब्राह्मण समझना

आज मेरी आत्मा मर गई
तो मैंने मुंडन करवा लिया
पंडो को बुला भोजन करवा दिया
ओन डिमांड- कबाब, नहारी और शावरमा बनवाया था

बदले में पंडो ने दक्षिणा में बस
कसम खिलवाई थी
कि अगली बार भी यही खिलायूँगा
और मोहल्ले पड़ोस में किसी को नहीं बतायूंगा

मैंने भी किसी राज की तरह
ये बात अपने सीने में दफ़न कर दी

आज मेरी आत्मा मर गई
तो मैंने मुंडन करवा लिया
पंडो को बुला भोजन करवा दिया

आज मुझे चमार नहीं ब्राह्मण समझना

Friday, July 20, 2012

BOOK REVIEW: ADRISHYA BHARAT



"किसी भी देश का संविधान कितना भी अच्छा क्यूँ ना हो, अगर उसे लागू करने वालो की नियत में खोट है तो वह कारगर सिद्ध नहीं होगा| और एक त्रुतिपूर्ण संविधान भी अगर अछे हाथो में है तो वह कारगर सिद्ध होगा|" ये शब्द थे, भारत के संविधान निर्माता, दलितों के मसीहा डा. भीम राव आंबेडकर के, जो भारत की जातिवादी प्रष्ठभूमि पर एकदम खरे उतारते है| क्यूंकि यहाँ कानून लागू करने वालो की नियत ही नहीं ईमान भी जातिवादी है| इसी जातिवादी नियत और ईमान के चलते पिछड़ी और निचली जातिंयो का पक्ष लेता एक भी कानून अपने मूल रूप में लागू नहीं हुआ और ना ही इन जातिंयो को इन कानूनों के तहत कोई फायदा दिखाने की चेष्ठा दिखाई गई| ऐसा ही कुछ हुआ 1993 के कानून "मैला ढोने का कार्य और शुष्क शौचालय निर्माण (निषेध) अधिनियम" के साथ |
मैला उठाना यानी इंसानी मल को दुसरे इंसान से साफ़ करवाना, निजी शौचालयों में और सरकारी-गैर सरकारी संस्थायो में बनाये गए सार्वजानिक शौचालयों में| सामान्य तौर पर मैला ढोना दो तरह से किया जाता है- पहला, शुष्क शोचालयों को साफ़ करके जहाँ मैला ढोने वाले व्यक्ति का काम इंसानी मल को जमीन, पत्थर, बाल्टी या किसी तसले से इकठ्ठा करके एक निर्धारित जगह पर फेकना होता है और दूसरा, लोगो के घरों या नगरपालिकायों के शोचालयों में बनी मैले की टंकियो (सीवेज पिट्स) को हाथ से साफ़ करना| ये औरते कहीं-कहीं तो सुबह 6 बजे से दोपहर 1  बजे तक काम करती है बिना एक आराम की सांस लिए, और सबसे ज्यादा दुखदाई तब होता है जब ये औरतें मैले से भरी गंधाती टोकरी को अपने सर पर उठाये इसे दूर फेंकने क लिए गॉव- शहर से 1-2 किलोमीटर तक बाहर जाती है| आँध्रप्रदेश की नारायण अम्मा बताती है जहाँ उन्होंने अपनी जिन्दगी के 40 साल ये मैला ढोने में निकाल दिए वहा एक बार में 400 औरते बैठ संडास किया करती थी और इन 40 सालों में उन्हें कभी उनके नाम से नहीं बुलाया गया |       
शायद ही दुनिया का कोई दूसरा काम इतना घ्रनित और कष्टकारी हो, जितना घ्रनित ये काम है उतनी ही घ्रनित मनिकता दिखी इस व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक बैठे अधिकारिंयो की इस कानून को लागू करने में| कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर कोने में भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रहे लोग ही मैला ढोने के काम में लगे रहे है| और इसमें भी 95-98% तक महिलाये लिप्त है |
बाबा साहब ने एक बार और कही थी अगर किसी समाज की तरक्की देखनी है तो पहले उस समाज की महिला की तरक्की देखो| तो महिलायों के इस % से हम इस समाज की महिलायों की दशा आराम से समझ सकते है| महिलायों का इतनी बड़ी संख्या में इस गंदे काम में लिप्त होना साफ़ साफ़ समाज में फैली पितृ सत्तात्मक बीमारी को दर्शाता है| जाती वाद ने जहा इस समाज को इस गंदे काम करने को मजबूर किया वही पितृ सत्ता ने महिलायों को और गर्त में धकेल दिया| तभी कहा जाता है कि इस समाज कि महिलाएं तीन तरफ से हाशिये की तरफ धकेली जाती है|
ये काम ही इतना कष्टकारी है कि इसने इस समाज में लगे महादलित यानी वाल्मीकियों को ही इस प्रथा को ख़तम करने को प्रेरित नहीं किया बल्कि बाकी दलित समाज और गैर दलित भी इस प्रथा को ख़तम करने को आगे आये| इसी कहानी की एक कड़ी है "भाषा सिंह " जिनकी किताब "अदृश्य भारत: मैला ढोने के बजबजाते यथार्थ से मुठभेड़" भारत की इसी लड़ाई को एक अगले पायदान पर ले जाने का एक हिस्सा है
भाषा सिंह जो अभी "नई दुनिया" में रोविंग एडिटर के पद पर कार्यरत है, जिन्हें 2005 में मैला प्रथा पर काम करने के लिए प्रभा दत्त फेलोशिप मिली, 2003 से मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ कार्यरत है| भाषा सिंह हर उस राज्य के छोटे बड़े इलाके की हर उस संकरी जातिवादी गलियों से गुजरते हुए हर उस महिला से मिली जिसने अपने सर पर मैले समेत पितृसत्ता और जातीवाद की टोकरी अपनी पूरी जिन्दगी बिना एक विरोधी आवाज उठाये निकाल दी| इन्होने मैला ढोने में लिप्त महिलायों को सिर्फ ये काम छोड़ने के लिए ही प्रेरित नहीं किया बल्कि अपने बच्चो को पढ़ाने, एक इज्जत का काम ढूंढने के लिए भी प्रेरित किया और इस जातिवादी और पितृसत्तात्मक समाज से लड़ने की शक्ति भी दी
भाषा सिंह अपनी किताब "अदृश्य भारत" के जरिये भारत के 11 राज्यों का जिक्र करती है जहा ये मैला ढोने की प्रथा अपने चरम पर है| ये राज्य कश्मीर, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, हरयाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, आँध्रप्रदेश और कर्णाटक है| इन राज्यों में काम करने वाली महिलाये बेशक अलग- अलग नामो से जानी जाती हो और बेशक इनकी जातियों के नाम अलग-अलग हो लेकिन ये सब वही गन्दा काम ही करती है और हर राज्य में एक ही बुरी नजर से देखि जाती है| इन औरतो को कई दशक बीत जाते है अपना नाम सुने| ये लगभग हर जगह अपने काम से ही जानी जाती है| बंगाल में डब्बूवाली, कानपुर में बाल्टीवाली, बिहार में टीनावाली, लखनऊ समेत पूरे उत्तर भारत में कमाई का काम करने वाली, हरयाणा और पंजाब में टोकरीवाली, दक्षिण भारत में थोट्टीकार, उडिषा में पाकी, पीती, वातल- जितने इलाके उतने नाम| इन इलाको में इनकी जातियां भी अलग- अलग है जैसे उत्तर भारत में इन्हें भंगी, मेहतर, वाल्मीकि, धानुक, चूड़ा, बालाशाही, मीरा, हलालखोर, हारी, बल्टीवालीडब्बूवाली, टीनावाली, तमिलनाडु में हेलाथोट्टी, और आंधप्रदेश तथा असम में पाकी और मेहतर आदि कहा जाता है| अब चाहे कानपुर की शांति हो, कोलकता की हीरा, माला, लक्ष्मनिया हारी, मुन्सरी वसफो, राजस्थान की इंदिरा, आँध्रप्रदेश की नारायण अम्मा, कश्मीर के अब्दुल रशीद शेख, मुनीरा, या शेख महोल्ला और इन लोगो से मिलवाती मजहबी, दिल्ली की मीना, बिहार की कुसुमी, हरयाणा की कौशल, गुजरात की पल्लवी बेन, या मध्यप्रदेश की ताजबाई फतरोड़| इन सब का इन नामो से कोई ताल्लुक नहीं है| ये सब जानी जाती है तो अपने काम या अपने जाती के नाम से| ये सभी अपनी कहानी भी बड़े साहस से सुनती है| भाषा सिंह ने इन सभी का उल्लेख अपनी इस किताब में बड़ी ही सुन्दरता से किया है |
भाषा सिंह एक बात बहुत जोर डाल कर कहती है कि इस अदृश्य भारत में मैला ढोने के बजबजाते यथार्थ से मुठभेड़ के लिए उन्हें डी-कास्ट और डी-क्लास होना पड़ेगा यानी बिना जातिहीन, बिना वर्गहीन हुए हम इस लड़ाई में कूद ही नहीं सकते, इसे जीतने कि बात तो कोसो दूर है |
भाषा सिंह ये भी बताती है की किस तरह वह इस प्रथा के खिलाफ काम करते करते लोग-बाग उन्हें मैला ढोने वाली पत्रकार के रूप में बुलाने लगे| ये शुरू हुआ गुजरात से जहाँ एक महिला उन्हें माथु मैलू पत्रकार और फिर वो जगह जगह इसी नाम से जाने जानी लगीं |
भाषा सिंह ये भी बताती है कि इस महिलायों कि जिन्दगी जितनी नीरस, गंदगी से भरी दिनचर्या वाली होती है, उनका खाना उतना ही चटक और स्वादिष्ट | मानो सारा स्वाद मसाले के साथ पीस-भून कर, खुशबु उड़ाते हुए, बदरंग जीवन में रस घोलने कि कोशिश हो | 
भाषा सिंह इस अपनी किताब में कुछ और अध्याय जोड़ती है जैसे- "बंद दरवाजों में फँसायी टांग" जिसमे वह इस प्रथा को ख़तम करने के लिए सफाई कर्मचारी आन्दोलन की 11 साल की कानूनी लड़ाई के संघर्ष को बताती है| और जैसे "सरकारी झूट का पानी होना" में बताती है कि किस तरह सभी राज्यों ने गलत हलफनामे दाखिल किये कि हमारे यहाँ ये मैला प्रथा होती ही नहीं है और जहा कही है वहां उन लोगी के खिलाफ कार्यवाही कि जा रही है जबकि कभी भी किसी भी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ 1993 के कानून के तहत कोई कार्यवाही नहीं की गई | और किस तरह संसद में बैठे सभी मंत्री झूट पे झूट बोले जा रहे है कि हम लोग काम कर रहे है इस प्रथा को ख़तम करने के लिए और हर बार एक नई समय सीमा बनाते है और बाद में खुद ही उसे तोड़ते है | "नाम में क्या रखा है", सच में नाम में कुछ नहीं रखा है, इस अध्याय में भाषा सिंह बताती है बेशक इस औरतो की कोई भी जाती हो या कोई भी नाम लेकिन ये बुलाई जाती है अपने काम के नाम से ही | कुछ और अध्याय  जैसे "सर पर मैला ढोना यानी.....", "कौन है मैला ढोने वाले...", और "शुष्क शौचालय यानी..." में भाषा सिंह बताती है किकिस किस तरह महिलाये और पुरुष इस काम में लिप्त है, ये लोग ऐतिहासिक रूप से कौन है जो इस गंदे काम से सदियों से बिना एक विरोधी स्वर के लगे हुए है, और किस किस तरह के होते है ये शुष्क शौचालय | 
इन सभी के बीच भाषा सिंह एक अध्याय "मैला ढोने का कार्य और शुष्क शौचालय निर्माण (निषेध) अधिनियम (1993)"  के लिए भी रखती है जिसका नाम "19 साल पुराना कानून रखती है" जो आज तक इंतजार मे है कि कोई इंसान आये और इसे अपने मूल रूप में लागू करे |

एक और नाम "बेजवाडा विल्सन" | इस नाम के बिना ना तो भाषा सिंह कि किताब पूरी हुई थी और ना ही मेरा ये लेख पूरा होगा बेजवाडा विल्सन जिन्होंने इस किताब के लिए आमुख "अदृश्य को दिखने कि कोशिश" लिखा और एक गैर-सरकारी संस्था "सफाई कर्मचारी आन्दोलन" को देश भर में चला रहे है जिनकी बदोलत आज भारत के सफाई कर्मचारी और मैला कर्मी अपनी आवाज बुलंद कर रहे है और धीरे धीरे इस काम को छोड़ भी रहे है और साउथ में ये काम लगभग अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है |  बेजवाडा विल्सन खुद कोलर, कर्नाटक से है, जिसका इस किताब में जिक्र भी है, बेजवाडा विल्सन की खुद की फैमिली ने भी लगभग 2-3 दशक तक इस काम को किया |    बेजवाडा विल्सन भी भाषा सिंह के साथ लगभग हर उस राज्य में घूमे जिन जिन  का इस किताब में जिक्र है | भाषा सिंह खुद कहती है कि उनकी मदद के बिना इस किताब का पूरा होना लगभग मुश्किल था | अगर भविष्य में किसी का नाम रखा जायेगा कि किस की बदोलत भारत से मैला प्रथा बंद हुई तो वो एक नाम होगा-बेजवाडा विल्सन |
कुल 240 पन्नो कि इस किताब के जरिये भाषा सिंह अदृश्य भारत की वो तस्वीर हमारे सामने पेश करती है जो दृष्य होते हुए भी अदृश्य है| मतलब जिसे इंसान आँखों के सामने होते हुए भी देखना नहीं चाहता| शायद गाँधी जी के ये शब्द "बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो", इस दृष्य भारत को अदृश्य बनाने की कड़ी का एक हिस्सा रहे होंगे |
हजारो-लाखो में कोई एक गैर-दलित ही होता है जो दलित दर्द समझता है, उसके लिए काम कर सकता है और वह ही उसे एक साफ़-सच्चे दिल से, मानवीयता के साथ लिख सकता है वो हजारो में एक आज भाषा सिंह हैं  |
                              

Monday, October 26, 2009

"विद्या बिना मति गई
मति बिना नीति गई
नीति बिना गति गई
गति बिना धन गया
धन बिना शूद्र पतित हुए
इतना घोर अनर्थ मात्र अविद्या
के कारन ही हुआ "
- महात्मा ज्योतिबा फुले